Tuesday, 13 August 2019

*** चंद लम्हों की सदियाँ

चंद लम्हों में ही सारी सदियाँ समेट लेती है
बिना कीमत मेरा प्यार खरीद लेती है

सो जाती है मेरी नींदे अपने सिरहाने रखकर
मेरे सपनों का सारा संसार खरीद लेती है

वक़्त के साथ बड़ी कशमकश सी है
तू उससे से भी मेरे हालात खरीद लेती है

दिल तो था ही तेरा फिर रूह पर क्यों
मेरे जीने का अधिकार ही खरीद लेती है

सारा जहां रोशन था जिसके ओज से
उस सूरज का सारा ताप खरीद लेती है

मोलभाव का हुनर तो नहीं है तेरी वफ़ा में
फिर कैसे नफ़े का पूरा व्यापार खरीद लेती है

बातें ना सही अपनी खामोशी ही सुना
तू तो बेजान से भी जान खरीद लेती है

जिस दौर में आई थी वो फिर देकर जा
तू तो मोहताज से भी ताज खरीद लेती है

चंद लम्हों में ही सारी सदियाँ समेट लेती है.....

~ राहुल मिश्रा ~

Saturday, 3 August 2019

फिर कश्मीर हमारा है

उन्होंने धर्म के नाम पर पाकिस्तान बना लिया
हमे सेकुलरिज्म थोपकर हिंदुस्तान बना दिया

वहाँ ज़िहाद के नाम पर हमें काटते रहे
यहाँ जातियों के नाम पर हमें बांटते रहे

नेहरू की कमज़ोरी ने कश्मीर हरा दिया
मोदी ने लालचौक पर तिरंगा फहरा दिया

कश्मीर की कश्मीरियत तब कहाँ गई थी
जब पंडितों को मारकर खानाबदोश बना दिया

कश्मीर से जब पंडितों का निर्वासन हुआ था
उसी श्राप से आतंकियों का निर्वाचन हुआ था

कहते हैं 370 हटने से मुसलमान कहाँ जाएगा
पत्थरबाज तब समझेगा जब खुद चोट खायेगा

कई सालों की ग़ुलामी की हरारत अब जा चुकी है
सदियों से गुम गुमान की आदत अब आ चुकी है

भगवा के सामने हर धर्म का रंग फीका है
मोदी आने के बाद पुनः हमने ये सीखा है

अमित शाह के साहस से गुंजा बस एक नारा है
कई दशकों के बाद अब फिर कश्मीर हमारा है

कई दशकों के बाद अब फिर कश्मीर हमारा है

~ राहुल मिश्रा ~

Sunday, 14 July 2019

*** संदर्भ सहित अर्थ है

किताबें हैं ज्ञान है
जिज्ञासाएं हैं विज्ञान है
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

वन हैं उपवन हैं
हरियाली है जीवन है
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

नदियां हैं झरने हैं
खुशियां हैं सपने हैं
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

कल्पनाएं हैं संभावनाएं हैं
स्पर्श हैं भावनाएं हैं
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

रात हैं सितारे हैं
रोशनी है नज़ारे हैं
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

मित्र हैं संसार है
चिंतन हैं प्यार है
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

सुर है संगीत है
झंकार है गीत है
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

प्रतिष्ठा है सम्मान है
प्रभुत्व है वरदान है
सब व्यर्थ है
तू ही मेरी सृष्टि का
संदर्भ सहित अर्थ है

~ राहुल मिश्रा ~

Friday, 12 July 2019

साठ बसंत के बाद

वो पुराने मकान की कच्ची दीवार पर
टंगे हुए मटमैले आईने की धूल को
जब अपने हाथों से सहलाया तो
जिस शक्श की तस्वीर दिखाई दी
वो बड़ा जुदा जुदा सा लगा

ना बचपन की मासूमियत थी
ना लकड़पन की जिज्ञासाएं
ना जवानी की मदहोशियाँ थी
ना खुद से कोई आशाएं

खुद से खुद की परछाई भी
हिचकिचाकर यह पूछ रही थी
तुझमे और इस पुराने खंडर में
जरा सोच कर बता कौन बड़ा है

मैं आज भी अपने पैरों पर खड़ा हूँ
तू खड़ा होकर भी लड़खड़ा रहा है

किवाड़ के किनारों पर लगे जालों से भी
ज्यादा उलझी हुई तेरी ज़िंदगी हो गई है

टूटी हुई चौखट की निकलती हुई
खलपटों सी तेरी चमड़ी हो गई है

ताक पर रखा हुआ दिया
और दिये की सूखी हुई बाती
फिर रौशन होने की आस जताती

कुछ उम्मीद की किरणें छन कर आ रही थीं
रोशनदान से होते हुए मुझे ये बता रही थीं

कि तू आस है प्रयास है विश्वास है
तेरे अपनो का उन सपनों का
जो तुझसे ज्यादा उनमें हैं
तुझसे जुड़े हुए जो कुनबे हैं

मैं तनिक भरमाया फिर मुस्कुराया
आंखों में चमक के साथ
स्वयं में पुनः ये विश्वास जगाया

इस इमारत को फिर बनाऊंगा
गुलिस्ताँ को हाथों से सजाऊंगा
उम्मीदों की हस्ती को मिटने नहीं दूंगा
फूलों की बस्ती को लुटने नहीं दूंगा

देखते ही देखते शहर फिर बस गया
बाजार की रौनक में फिर फस गया
कुछ वक्त पहले जहां हर रात काली थी
आज उसी जगह हर रात दीवाली थी
आज उसी जगह हर रात दीवाली थी

~ राहुल मिश्रा ~

Monday, 10 June 2019

*** - बिन फासलों की नजदीकियां

नजदीकियां अब इतनी हो गई हैं
कि ना आसमान दिखता है ना ज़मीं
खो गया हूँ तेरे आग़ोश में इस क़दर
कि ना बुराइयां दिखती हैं ना कमी

दूर तक साथ चलना है तो
हाथ थामे रखना होगा
फ़ासला दरम्यां कुछ इतना हो
कि ना हवा गुजर पाये ना नमी

करीब ना होकर भी तुझे अब
महसूस करने लगा हूँ मैं
नज़दीकियों का आलम ये है
कि ना शुबहा है ना फहमी

किस्से खुद के खुद से गढ़ता हूँ
हर हिस्से में तुझको रखता हूँ
हर हिस्सा मुझसे कहता है
कि ना सुकून मिलता है ना कमी

~ राहुल मिश्रा ~

Monday, 3 June 2019

*** - ये सिर्फ बातें नहीं हैं

जिन्हें आज तुम बातें कहती हो
बस वो ही याद रहेंगी एक दिन
बाकी सब धुंधला हो जाएगा

इतनी करुणा है इन बातों में कि
मुरझाया हुआ फूल उस दिन
कली बनकर फिर खिल जाएगा

हवाओं में उड़ती हुई अपनी वो जुल्फें
दूर से निहारता हुआ किसी को देखोगी
तो ये रांझा फिर याद आएगा

जो खुद एक मिसाल है तारीफों की
उसके लिए मैं क्या तारीफ करूँ
एक दिन खुदा खुद उसकी अहमियत
इस दुनिया को समझायेगा

उसका कोमल हॄदय उसकी आवाज़
सब इतना प्यारा है कि आसमान खुद
उसके कद के आगे सिर झुकायेगा

तुम मेरी हो सिर्फ मेरी हो
मेरा यही खयाल एक दिन
तुम्हें फिर मेरे पास लेकर आएगा

तुम्हारी मुस्कान ही तुम्हारी पहचान है
यही याद दिलाने के लिए
कोई फिर एक दिन
तुम्हारे इतने पास आएगा

बस बातें ही याद रहेंगी
बाकी सब धुंधला हो जाएगा

~ राहुल मिश्रा ~

*** - आहटें - कुछ मेरे मन की कुछ तेरे मन की

खटखटाने की ज़रूरत नहीं
दस्तकें ही काफी हैं
मन में हलचल मचाने को

आहटें पैदा कर ही देंगी तूफान
मुलाकातों की कश्तियाँ किनारे लाने को

तेरी सोच से कहीं ऊंचा
आसमान है मेरे प्रेम का
जितना प्रखर जाओगी
मन मचल जाएगा खो जाने को

वो आहटें कुछ बेचैन करेंगी
विरह में गीले नैन करेंगी
पर ये सूरज अडिग है आसमान में
तेरी पीड़ाओं को गले लगाने को

अपनी हँसी की पहचान बनाना
दूसरे तो बहाना ढूंढेंगे ही रूठने का
तुम जो खड़ी हो उन्हें मनाने को

अपने अंदर जो समाई हैं नदियां तूने
बहा दे मेरे समंदर में
मैं हूँ ना बैठा तुझे अपनाने को

खुद का ख्याल ये सोच कर रख लेना
कि कोई पागल है उस ओर भी
तेरी एक हल्की सी मुस्कान पाने को

दस्तकें ही काफी हैं
मन मे हलचल मचाने को
दस्तकें ही .......

*** - तुम्हारी यादें

मेरी यादों को मुकम्मल होने के लिए
तेरी हिचकियों की ज़रूरत नहीं
तेरी यादों में फना होने के लिए
मुझे सिसकियों की ज़रूरत नहीं

तेरी यादों का मौसम आज सुहाना लगे
एक शाम और चुरा लूं अगर बुरा ना लगे (inspired)

तुझसे रूबरू होने को
आज फिर दिल करता है
करीब से गुजारे हुए लम्हें जीने को
आज फिर दिल करता है

तेरी आँखों ने कल मुझे
मेरी अहमियत का अहसास कराया है
तू लफ़्ज़ों से भले ना कहे
दिल ने दिल को चुपके से बताया है

तेरी हल्की सी छुअन और
प्यार की मीठी सी सिहरन
वो कांधे पर तेरा सिर
और मेरे मन की उलझन

कहीं तू वो हीर तो नहीं
जिसका रांझा था मैं
जो किसी का ना हुआ
पर तुझसे सांझा था मैं

आज तुझे अपने प्यार की
हद दिखाने का मन करता है
उन्हीं लम्हों को दोबारा
जी जाने का मन करता है

करीब से गुजारे हुए लम्हें
फिर जी जाने को मन करता है

~ राहुल मिश्रा ~

*** - चाहत का इज़हार

पहली ही नज़र में पढ़ लिया था मैंने तुम्हें
बस कुछ वक्त दिया था संभलने के लिए
कब तक छिपा पाओगी तुम
और छिपा कर कहाँ जाओगी तुम

मेरे पास आने से डरती हो
पर दूर रहकर भी तो तड़पती हो
कब तक खुद से खुद को दूर रख पाओगी तुम
सच कहो क्या मेरे बगैर कुछ पल भी रह पाओगी तुम

अब बात आदत से बढ़कर ज़रूरत की हो गई है
अब बात मोहब्बत से बढ़कर इबादत की हो गई है
क्या मन मे रखकर चैन से सो पाओगी तुम
क्या इतना पाकर भी मुझे खो पाओगी तुम

इतने दिनों में मैंने जितना जाना है तुम्हें
सब भूलकर प्यार से गले लगाना है तुम्हें
समय कम है तो क्या हुआ
खुद को भूलकर बस अपनाना है तुम्हें

खुद को भूलकर बस अपनाना है तुम्हें

~ राहुल मिश्रा ~

Tuesday, 14 May 2019

*** - बिन रिश्ते की एक गहराई

कभी खुद पर भी गुस्सा जो आये ना
तो मेरी नज़र से निहार लेना
प्यार की बारिश में ना भीग जाओ तो कहना

कभी खुद से कशमकश होने लगे ना
तो मेरी सोच से समझ लेना
हर मुश्किल पार ना हो जाए तो कहना

कभी खुद को भूल जाओ ना
तो मेरी यादों में झांक लेना
आंखें नम ना हो जाएं तो कहना

कभी अकेले में याद सताए ना
तो मेरी बातों को दोहरा लेना
होठों पर मुस्कान ना आ जाये तो कहना

कभी धुन प्रणय में डूबने की हो ना
तो मेरा निश्छल प्रेम पा लेना
स्वयं से प्यार ना हो जाये तो कहना

जो मैं आया हूँ इस तरह तेरी दुनिया मे
कोई तो वजह होगी ही ना
कभी बेवजह ही पुकार लेना
मन मगन ना हो जाये तो कहना

~ राहुल मिश्रा ~

Friday, 11 May 2018

प्रेम में संवाद और संवाद में प्रेम


प्रेम में संवाद और संवाद में प्रेम

श्याम तुम्हारे कांधे पर
सिर रखकर मैं खो जाती क्यूँ
सुनकर संगीत बांसुरी का
मैं तुममे ही रम जाती क्यूँ

तुम्हारे अंदर का अर्ध नर मैं हूँ
मेरे अंदर की अर्ध नारी तुम हो
प्रेम रूपी जीवन की नैया मैं हूँ
मेरे हृदय में बसी सवारी तुम हो

प्रेम बसा हो जीवन मे
तो स्वर्ग यहीं स्वर्गलोक यहीं
सन्यासी का तप यही
ब्रह्मज्ञान का आलोक यहीं

जीवन संघर्ष है भोग है
कभी आनंद कभी रोग है
जिस मन समाया प्यार है
उसी ने जीता संसार है

तुम विचलित ना हो राधे
ये रिवाज सभी को निभाना होगा
कभी शीतल हवा तो कभी अंगारे होंगे
अग्नि परीक्षा से गुजर कर हमे जाना होगा।।

#राधे_कृष्ण

~ राहुल मिश्रा ~

Tuesday, 8 May 2018

विरह मिलन की बेला



संध्या काल के विचरण में
मुख देख यमुना के दर्पण में
राधा रानी दौड़ पड़ीं
अपने कान्हा की शरण में

राधिका बोलीं कान्हा से
क्यों ऐसा होता मेरे साथ
जब होते दूर नैनों से तुम
अच्छी ना लगती कायनात

क्या तुमने मेरी याद में
अश्रु संग प्रेम बहाया है

कन्हैया बोले प्रेम तुम्हारा
अपनी आंखों में बसाया है
फिर कैसे अमर प्रेम को
अश्रु संग बह जाने दूँ मैं
हर बूंद तुम्हारे प्रेम की
कैसे अभ्र जाने दूँ मैं

ना कामना ना वासना
ये प्रेम तप यही साधना
तुम बसीं हृदय में साक्षात
हर स्पंदन है आराधना

मिलन जीव का हो ना हो
हम आत्मा के मीत हैं
हर पीड़ाओं से परे हम तुम
एक दूजे के मनमीत हैं।।

#राधे_कृष्ण

~ राहुल मिश्रा ~

Monday, 7 May 2018

प्रेम में संपूर्णता



प्रेम स्वयं में कभी पूर्ण नहीं होता
जो प्राप्त हो जाये वो सम्पूर्ण नहीं होता

प्रेम में मनुष्य परिपूर्ण होता है
मनुष्य में प्रेम कभी पूर्ण नहीं होता

राधा जब कृष्ण में होती हैं
तब वो पूर्ण होती हैं
कृष्ण जब राधा में होते हैं
तब वो सम्पूर्ण होते हैं

राधा कृष्ण संग में सर्वस्व हैं
अनंत पीड़ाओं के बीच प्रेम का वर्चस्व हैं

तुम राधा और मैं ही कृष्ण हूँ
तुम्हारी निरुत्तर अवस्था का मैं ही प्रश्न हूँ

हम कलयुग में प्रेम की सजीवता के उदाहरण हैं
जीवन की हर विकटता का एक मात्र निवारण हैं

तुम वृंदावन से चलकर यमुना तट पर आ जाना
मैं मथुरा की गलियों से आगे राह तुम्हारी देखूंगा

जो ढूंढ ना पाओ कभी मुझे तो नैनन अश्रु ना लाना
एकचित्त हो मुरली धुन से राह तुम्हें दिखलाऊंगा
एक कदम जो तुम बढ़ो दस कदम मैं आगे आऊंगा ।।

#राधे_कृष्ण

~ राहुल मिश्रा ~

Sunday, 6 May 2018

प्रेम में जीवन और जीवन मे प्रेम



प्रेम बिन जीवन
तर्पण बिन समर्पण

भावनाओं बिन प्रीत
नयनों से परे मीत

आत्मा बिन देह
आकर्षण का स्नेह

सत्य बिन बंधन
मिलन का अभिनंदन

ध्यान बिन स्तुति
मिलन की अनुभूति

आशा बिन विश्वास
त्याग का अहसास

तुम बिन मैं
और मुझ बिन तुम

सब अपूर्ण है

तब एक मात्र श्री कृष्ण ही सम्पूर्ण हैं।।

#राधे_कृष्ण

~ राहुल मिश्रा ~

Thursday, 1 June 2017

हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

स्वयं ब्रह्मा जिसे धारण करें
ऐसा आवरण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

माथे तिलक काँधे जनेऊ साजे
सनातनी संस्कृति का आचरण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

राम को धनुष एवं कृष्ण को चक्र देने वाले
परशुराम की तरह विलक्षण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

यज्ञों में दी गयी आहुति के
संस्कारों का मिश्रण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

शिक्षा की ज्योत जलाकर
विश्व मैं प्रकाशित चित्रण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

सम्पूर्ण जग को अपनी झोली में समेटे
सभी को देता संरक्षण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

राजनैतिक गलियारों में
कहलाता सवर्ण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

जब दुनिया मांगती आसरा
तब शिखर को छूता बिना आरक्षण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

देश रक्षा के लिए सर्वप्रथम
दिया जाने वाला तर्पण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं  

अपनी सभ्यता को जग में प्रदर्शित करने वाला
पारदर्शी दर्पण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

स्वयं को तपाकर दुनिया को बचाने वाला
१००% खरा स्वर्ण हूँ मैं
हाँ ब्राह्मण हूँ मैं

~ राहुल मिश्रा ~

Thursday, 29 December 2016

हौसला

हौसला

अक्सर एक धुंधली सी परछाई दिखाई देती है
जो मुझसे कहती है
तू क्या था और क्या हो गया है
जीवन की धुंध में तेरा मासूम चेहरा कहाँ खो गया
तुझे नींद से जागना है
ठोकर से उठकर फिर भागना है
तुझे थमना नहीं है लड़ना है
अकेले नहीं सब को साथ लेकर आगे बढ़ना है
तुझे तेरी राह जीवन में खुद बनानी है
मेरी सौंपी हुयी जिम्मेदारी निभानी है
परेशानियों से लड़ने का हौसला मैं तुझे दूंगा
तुझमे क्षमता है
पृथ्वी की तरह सभी को स्वयं में समाने की
हवा की तरह चहुंओर सुगंध फैलाने की
आकाश के सामान बेरंग बने रहने की
अग्नि की तरह बुराइयों को भस्म कर देने की
जल की तरह निस्वार्थ बहने की
और सूर्य के सामान प्रकाशवान करने की

पंचतत्वों के सर्व गुणों को व्याप्त कर
तू आगे बढ़ बस आगे बढ़

~ राहुल मिश्रा ~

Friday, 23 December 2016

ग़लतफ़हमियां

ग़लतफ़हमियां

पहली मुलाकात से दोस्ती और दोस्ती से प्यार तक
कई बार हुई थीं ग़लतफ़हमियां
प्यार के लम्हों से तकरार तक, उन तकरीरों से फिर प्यार तक
कई बार हुई थीं ग़लतफ़हमियां
ऐसा नहीं है कि सिर्फ तकलीफ़ ही देती हों,
कुछ समय के लिए ही सही पर
कई बार  सुकून के मीठे पल भी दे जाती हैं ग़लतफ़हमियां
तुझे देखकर तुझे चाहकर तुझे पाने की आस पर
मेरे मन में कुछ अहसास भर जाती हैं ग़लतफ़हमियां
इज़हार के इंतज़ार में फिर इंतज़ार से इनकार तक
कई बार सही हैं ग़लतफ़हमियां
कभी हँसते तो कभी रोते आंसुओं में बही हैं ग़लतफ़हमियां
तेरे साथ चलते चलते स्वयं को उत्कृष्ट समझ बैठा था
क़दमों की हर आहट पर पाल बैठा था ग़लतफ़हमियां
जो होश आया तो सब कुछ जा चुका था
कुछ बचा था तो वो थीं ग़लतफ़हमियां

~ राहुल मिश्रा ~

Wednesday, 6 April 2016

तंजील अहमद - A Real Hero

कितने तंजील मारोगे हर घर से तंजील निकलेगा
मातृभूमि के सीने पर जब जब खंजर लहराएगा
अफ़ज़ल जैसे गद्दारों का जब नाम जुबां पर आएगा
बेटा भारत माता का फिर गोली सीने पे खाएगा
और देश की मिट्टी में जन्मा फिर मिट्टी में मिल जायेगा
उस माटी से जन्मे तंजील चुन चुन दुश्मन को मारेंगे
फिर देशभक्ति का लावा तब फूट ज्वालामुखी निकलेगा
तुम कितने तंजील मारोगे हर घर से तंजील निकलेगा
अब सुन ले तू हुंकार मेरी
मैँ आज प्रतिज्ञा लेता हूँ
देशद्रोह के अंगारे जो भी ज़ुबान से उगलेगा
हर घर में घुस के मारेंगे जिस घर से अफ़ज़ल निकलेगा

~ राहुल मिश्रा ~

Tuesday, 19 January 2016

कृषि प्रधान देश के किसान का मर्म

मेरे उत्तिष्ठ देश की पवित्र आत्मा है किसान
पसीना बहाकर मुझे अन्न देने वाला परमात्मा है किसान
जिस मिट्टी का क़र्ज़ आज तक ना चुका पाया मैं
उस मिट्टी को उपजाऊ बनाता है किसान l
कैसे नाज़ करूँ अपनी कमाई पर मैं
मेरे तो परिवार की भूख मिटाता है किसान
तब दुःख नहीं शर्म महसूस होती है
जब एक लाख के क़र्ज़ से मर जाता है किसान ll

सुना है देश में डिजिटल क्रांति आयी है
फिर क्यों उस विधवा के घर शांति छाई है
दर्द उसका मेरे शब्दों से बयां नहीं होगा
एहसास करना है तो पढ़ उसके चेहरे पर जो उदासी छाई है

क्यों बेबस है तू इतना,
क्या तुझे याद नहीं
जब मुहीम तुझे अपना बनाने की थी
शर्त सिर्फ चुनाव में जीत दिलाने की थी ll
वो खादी पहन जो तेरे पास आये थे
जिन्हे वोट देकर तूने भी कुछ सपने सजाये थे l
आज सूट पहन कर विदेशी दौरों पर जाते हैं
तेरी जमीन पर फैक्ट्री लगाने का इन्वेस्टमेंट लाते है l
अब तुझे भी तेरे अमूल्य योगदान को जताना होगा
उन्हें, जो तेरा मोल अपने बजट में तय कर जाते हैं ll

मेरा उद्देश्य तेरे निरादर का नही
फ़रियाद है, बस मुझे भी साथ ले ले
विकास की इस दौड़ में केवल हम ही क्यों पीछे छूट जाते हैं ll

जब प्रकृति नहीं नीति की मार से आत्महत्या करता है किसान l
तब किस गर्व से कहूँ कि मेरा देश है कृषि प्रधान ll
मेरा देश है कृषि प्रधान !!!!!!

Thursday, 6 August 2015

चालान से रिश्वत और भ्रष्टाचार

"चालान से रिश्वत और भ्रष्टाचार"

चालान के चक्कर में ट्रैफिक पुलिस वाला भी
कभी कभी ऐसे ऐंठता है l
बाइक पर सीट बेल्ट और कार में हेलमेट जैसे सवाल
पूछ बैठता है ll
९०% चालान रिश्वत में कन्वर्ट हो जाते हैं l
९५% अन्ना हज़ारे वाले आंदोलनकारी भी
भ्रष्टाचार की यह रस्म बखूबी निभाते हैं ll
एक सफल डील के बाद लोगों के हाव भाव ही बदल जाते हैं l
खुद को हसन अली और नीरा राडिया समझने लग जाते हैं ll
आज की सफलता कल का हौसला बढ़ा जाती है l
पैसों की पेशगी ईमानदारों का ईमान डगमगा जाती है ll
आपकी यह हरक़त एक सामाजिक बुराई पैदा कर जाती है l
और अंत में ऊँगली बस सरकार पर उठाई जाती है ll
कभी खुद के गिरेबां में झाँक कर देख लें
इतनी बुराइयां नज़र आ जायेंगी l
दूसरों की कमियां देखने को फिर
आपकी नज़रें ना उठ पायेंगी ll

~ राहुल मिश्रा ~